ग्लोबल वार्मिंग क्या है | Global Warming in Hindi

वर्तमान में Global Warming वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। क्योंकि इस समस्या के कारण पृथ्वी के सभी जीवों पर खतरा मंडरा रहा है।

Global Warming के कारण ही विश्व के बड़े-बड़े ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं और समुद्रों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। इससे समुद्रों के किनारे बसे देशों और द्वीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

इस खतरे को देखते हुए विश्व स्तर पर कई पहल किये जा चुके हैं और बड़े-छोटे सभी देश Global Warming को कम करने के लिए प्रयासरत भी हैं।

इस लेख में हम इसी विषय पर जानकारी देने जा रहे हैं कि आखिर Global Warming क्या है और इसके बढ़ने के कौन-कौन से कारक हैं।

साथ ही इस लेख में Global Warming से संबंधित सम्मेलनों और बैठकों के बारे में भी जानकारी दी गई है।

तो आईए जानते हैं कि Global Warming क्या है।

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Global Warming क्या है और यह जलवायु को कैसे प्रभावित कर रहा है।

Global Warming अर्थात भूमंडलीय ऊष्मीकरण या वैश्विक तापन का अर्थ है पृथ्वी के वायुमंडल और समुद्र के औसत तापमान में वृद्धि। तापमान में यह वृद्धि निरंतर हो रही है और 20 वीं शताब्दी में और तेजी से हुई है।

Global Warming के कारण ही मौसम में असामान्य परिवर्तन जैसे कि वर्षा की मात्रा में परिवर्तन, जलवायु परिवर्तन हो रहे हैं तो अन्य भौगोलिक परिवर्तन भी देखने को मिल रहे हैं, जैसे – ग्लेशियर का पीछे हटना, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि आदि I

किसी भी ग्रह पर जीवन के लिए कुछ अनुकूल भौगोलिक दशाएँ होना आवश्यक हैं I इनमें अनुकूल तापमान भी एक आवश्यक दशा है I  यदि तापमान आवश्यकता से कम या अधिक हो तो जीवन संभव नहीं है I 

पृथ्वी पर जीवन इसीलिए संभव है क्योंकि यह Goldilocks Zone में स्थित है और यहाँ एक अनुकूल तापमान उपस्थित है I 

Goldilocks Zone – इसे वासयोग्य क्षेत्र (Habitable Zone) भी कहा जाता है I यह तारे के चारों ओर का वह क्षेत्र है जहाँ का तापमान ना तो बहुत ठंडा होता है और ना ही बहुत गर्म और जहाँ पानी द्रव अवस्था में रह सकता है I 

स्पष्टतः हमारी पृथ्वी पर भी इस तरह का तापमान उपस्थित है जिसके कारण यहाँ जीवन संभव हो सका है I

लेकिन यहाँ ऐसे क्षेत्र भी मौजूद हैं जहाँ का तापमान जीवन अनुकूलित तापमान अर्थात 15 डिग्री सेल्सियस से कम या अधिक है I बावजूद इसके ऐसे क्षेत्रों में जीवन उपस्थित है।

पृथ्वी पर तापमान बढ़ने अर्थात Global Warming का प्रमुख कारण ग्रीनहाउस गैसें हैं I इन गैसों की वजह से पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न होता है और पृथ्वी का तापमान बढ़ता है।

ग्रीनहाउस गैसें क्या होती हैं, यह जानने से पहले इसकी जानकारी भी जरुरी है कि ग्रीनहाउस क्या होता है और ग्रीनहाउस प्रभाव क्या होता है I

ग्रीनहाउस प्रभाव / Greenhouse effect:-

सूर्य से आने वाले प्रकाश अर्थात सौर विकिरण में दृश्य और पराबैंगनी(Ultravoilet) किरणें मौजूद होती हैं I ये छोटे तरंगदैर्ध्य(short-wavelength) वाली किरणें होती हैं और आसानी से पृथ्वी के वातावरण को पार करके पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाती हैं I

Global Warming
ग्रीनहाउस प्रभाव

लेकिन सूर्य से आने वाले प्रकाश का पूरा भाग पृथ्वी की सतह पर नहीं पहुँच पाता है I उनमें से 30 प्रतिशत भाग पृथ्वी पर पहुँचने से पहले ही वायुमंडल के ऊपरी सतह, बादलों तथा पृथ्वी की सतह द्वारा अंतरिक्ष में पुन: परावर्तित कर दिया जाता है I

सौर विकिरण के इस परावर्तित भाग को पृथ्वी का Albedo कहते हैं I 

19 प्रतिशत भाग को पृथ्वी के वातावरण और बादलों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है I शेष 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी के धरातल द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है I

इसमें से कुछ भाग के कारण पृथ्वी की सतह गर्म होकर विकिरण पैदा करती है जिसे पार्थिव या भौमिक विकिरण कहते हैं I

कुछ भाग जलवाष्प की गुप्त ऊष्मा में तथा कुछ भाग  वायु को गर्म करने तथा उसके संवहन लिए प्रयोग कर लिया जाता है I

भौमिक विकिरण लम्बे तरंगदैर्ध्य वाली होती है जो पृथ्वी से अवरक्त ऊष्मीय विकिरण(Infrared thermal radiation) के रूप में निकलती हैं I 

चूँकि ये लम्बे तरंगदैर्ध्य वाली विकिरण होती हैं इसलिए ये पृथ्वी के चारों तरफ उपस्थित वायुमंडल को भेद नहीं पाती हैं और उनका अधिकतम भाग वायुमंडल द्वारा ही अवशोषित कर लिया जाता है I

इसी अवशोषित ऊष्मा द्वारा हमारी पृथ्वी गर्म रहती है और यहाँ जीवन संभव हो पाता है I 

ग्रीनहाउस / Greenhouse:–

Greenhouse / Glasshouse या हरितगृह उन क्षेत्रों में बनाये जाते हैं जहाँ का तापमान इतना कम होता है कि फल, सब्जियाँ या फूल पैदा नहीं किये जा सकते I वहाँ कम तापमान होने के कारण किसी भी प्रकार की खेती संभव नहीं हो पाती है I

हालाँकि यहाँ सूर्य की इतनी किरणें अवश्य पहुँच जाती हैं कि हरितगृह का प्रयोग करके अनुकूल तापमान उत्पन्न किया जाता है और फल, सब्जियाँ या फूल की खेती की जा सकती है I

हरितगृह काँच या ऐसे प्लास्टिक के बने होते हैं जो पृथ्वी के चारों तरफ उपस्थित वायुमंडल की तरह ही काम करते हैं I 

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि सौर विकिरण सूर्य से लघु तरंग के रूप में पृथ्वी पर पहुँचती हैं I 

उपरोक्त चित्र से स्पष्ट है कि सौर विकिरण, जो सूर्य की ऊर्जा की वाहक होती हैं, काँच या प्लास्टिक से बने हरितगृह के अन्दर प्रवेश तो कर जाती हैं लेकिन आसानी से बाहर नहीं निकल पाती हैं I 

जब ये काँच या प्लास्टिक से बने हरितगृह के अन्दर प्रवेश करती हैं तो पृथ्वी की सतह को गर्म कर देती हैं जिससे लम्बे तरंगदैर्ध्य की विकिरण पैदा होती है I

ये विकिरण काँच या प्लास्टिक को पार नहीं कर पातीं और हरितगृह के अन्दर तापमान में वृद्धि हो जाती है जो फल और सब्जियाँ उगाने के लिए पर्याप्त होता है I

Greenhouse Gases क्या हैं: –

पृथ्वी की गर्म सतह से परावर्तित विकिरण पृथ्वी के चारों ओर उपस्थित वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है I ऐसा वायुमंडल में मौजूद कई रासायनिक यौगिकों के कारण होता है जो ग्रीनहाउस गैसों के रूप में व्यवहार करते हैं I

ये ग्रीनहाउस गैसें सूर्य से आने वाली लघु तरंगदैर्ध्य की किरणों को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करती हैं। लेकिन पृथ्वी की सतह से पुनः विकरित दीर्घ तरंगदैर्ध्य (इंफ्रारेड) की ऊर्जा को ये अवशोषित कर लेती हैं I

इस अवशोषित ऊर्जा के कुछ भाग को ये अंतरिक्ष में वापस जाने देती हैं और शेष ऊर्जा को पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः फैला देती हैं I  इसी ऊर्जा से पृथ्वी को गर्मी मिलती है जिससे यहाँ जीवन संभव हो सका है I

ये ग्रीनहाउस गैसें प्राकृतिक रूप से वायुमंडल में उपस्थित होती हैं और उतनी ही गर्मी उत्पन्न करती हैं जितनी कि पृथ्वी पर जीवन के लिए जरुरी है I

लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद इन गैसों की मात्रा बढ़ने लगी और वर्तमान में यह इस स्तर तक पहुँच गई है कि यह जीव जगत के लिए खतरनाक साबित हो रही है I

वायुमंडल में इन गैसों की सांद्रता बढ़ने के कारण पृथ्वी के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है I

प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें:– 

पृथ्वी के वायुमंडल में प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों तरह की ग्रीनहाउस गैसें मौजूद हैं I 

प्राकृतिक रूप से वायुमंडल में उपस्थित ग्रीनहाउस गैसें हैं – कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, जलवाष्प और नाइट्रस ऑक्साइड I इन्हें प्राकृतिक कहने का अर्थ है कि ये मानव जाति की मौजूदगी से पहले वातावरण में उपस्थित थीं I 

जैसे- जैसे मानव जाति ने अपना विकास किया वैसे-वैसे इन गैसों मात्रा में वृद्धि होने लगी I

अन्य ग्रीनहाउस गैसों को “कृत्रिम” कहा जा सकता है क्योंकि उनका उत्सर्जन केवल मानवीय गतिविधियों के कारण होता है। 

कृत्रिम ग्रीनहाउस गैसों में प्रमुख हैं –  क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC),परफ्लूरोकार्बन (PFC) और सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF6)। इन्हें फ्लोराइड युक्त गैस (fluorinated gas) भी कहते हैं I 

जल वाष्प:-

यह पृथ्वी के वायुमंडल में पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहता है I यह सबसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है लेकिन इसका व्यवहार मौलिक रूप से अन्य ग्रीनहाउस गैसों से अलग है। क्योंकि इसके उत्पन्न होने के लिए प्रत्यक्ष रूप से मानव गतिविधियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। 

वायुमंडल में जल वाष्प की मात्रा में वृद्धि को एक जलवायु प्रतिक्रिया (climate feedback) के रूप में माना जा सकता है I

पृथ्वी की सतह जितनी गर्म होती है उसके संपर्क में आने वाली हवा भी उतनी ही गर्म होती जाती है I चूँकि गर्म हवा अधिक नमी धारण करने में सक्षम है। इसलिए जैसे-जैसे हवा गर्म होती जाती है,जल स्रोतों और पृथ्वी की सतह से पानी का वाष्पीकरण दर उतना ही अधिक होता है I 

परिणामस्वरूप वाष्पीकरण बढ़ने से निचले वायुमंडल में जल वाष्प की सांद्रता में वृद्धि हो  जाती है, जो अवरक्त विकिरण को अवशोषित करने और सतह पर वापस छोड़ने में सक्षम होती है।

इस तरह जलवाष्प Global Warming  की वृद्धि में योगदान दे रहा है I

जलवाष्प अन्य ग्रीनहाउस गैसों की तुलना में बहुत कम समय के लिए वातावरण में रहता है I 

कार्बन डाइऑक्साइड:- 

कार्बन डाइऑक्साइड एक महत्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है जिसके बिना हमारी पृथ्वी इतनी ठंडी हो जाएगी कि यहाँ जीवन संभव नहीं होगा।

लेकिन पृथ्वी के वायुमंडल में इसकी सांद्रता में धीरे-धीरे वृद्धि होने से Global Warming  में भी वृद्धि होती जा रही है I 

वैज्ञानिकों के अनुसार –

औद्योगिक गतिविधियों से पहले  कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 280 ppm के आसपास थी जो अब बढ़कर लगभग 415 ppm हो गयी है I इस प्रकार हमारे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर औद्योगिकीकरण की शुरुआत से लगभग 40% बढ़ गया है I

कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन प्राकृतिक रूप से भी होता है और इसके महत्वपूर्ण स्रोत हैं – ज्वालामुखी उदगार,  श्वसन प्रक्रिया, जंगल की आग आदि I

औद्योगिक क्रांति के बाद मानव गतिविधियों द्वारा कृत्रिम रूप से भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होने लगा I

मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जलने से कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि होती जा रही है। इन ईंधनों का उपयोग वाहनों को चलाने, औद्योगिक रसायनों के निर्माण में, बिजली पैदा करने में किया जाता है।

कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में अन्य मानवजनित स्रोतों में वनों को जलाना और आग लगाकर भूमि की सफाई भी शामिल है।

वातारण में मौजूद अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने और उसे संग्रहीत करने के लिए प्राकृतिक प्रणाली है जिसे कार्बन सिंक कहा जाता है I 

मुख्य प्राकृतिक कार्बन सिंक हैं – पेड़ – पौधे, महासागर और मिट्टी। पेड़ – पौधे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से अपने लिए भोजन बनाते हैं I

इस तरह कार्बन डाइऑक्साइड के एक बहुत बड़े भाग का ग्रहण पेड़-पौधों द्वारा कर लिया जाता है I

लेकिन इधर कुछ वर्षों से जंगलों की कटाई के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हुई है I 

महासागर कार्बन डाइऑक्साइड के लिए एक प्रमुख कार्बन सिंक हैं। समुद्री जीव और पौधे प्रकाश-संश्लेषण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड गैस का प्रयोग करते हैं, जबकि कुछ कार्बन डाइऑक्साइड समुद्री जल में घुल जाते हैं।

मीथेन (CH4):-

मीथेन एक रंगहीन, गंधहीन और अत्यधिक ज्वलनशील गैस है I जब इसे ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलाया जाता है, तो यह कार्बन डाइऑक्साइड और जल वाष्प पैदा करता है।

मीथेन प्राकृतिक गैस का प्राथमिक घटक है और इसका उपयोग बिजली का उत्पादन करने के साथ-साथ रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भी किया जाता है जैसे हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन ब्लैक जैसी गैसों के उत्पादन में I

मीथेन जब अपने मूल रूप में रहता है तो यह सूर्य की गर्मी को अवशोषित करता है, जिससे वातावरण गर्म होता है। इस कारण से इसे कार्बन डाइऑक्साइड की तरह ग्रीनहाउस गैस माना जाता है और यह कार्बन डाइऑक्साइड के बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है।

मानव निर्मित Global Warming  का लगभग 25%, मीथेन उत्सर्जन के कारण हो रहा है I

इसका उत्सर्जन प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों रूप से होता है I

मुख्य प्राकृतिक स्रोतों में आर्द्रभूमि (Wetlands) मीथेन के सबसे बड़े उत्सर्जक हैं I 

आर्द्रभूमि का मतलब ऐसी जगहों से है जहाँ पानी से भरी मिट्टी पाई जाती है I इन जगहों पर पाए जाने वाले पौधों और जानवरों की प्रजातियों की विशिष्टता होती है कि ये पानी की निरंतर उपस्थिति में भी अपने आप को विकसित और अनुकूलित कर लेते हैं।

अधिकांश मीथेन उत्पादन ऐसी जगहों पर होता है जहाँ के वातावरण में ऑक्सीजन की कमी होती है। यहाँ Microbes, जैसे कि बैक्टीरिया जो गर्म और नम वातावरण में रहते हैं, वे ऑक्सीजन का अधिक तेजी से उपभोग करते हैं और वायुमंडल में मीथेन का उत्सर्जन करते हैं I 

आर्द्रभूमि में इस तरह का आदर्श अवायवीय वातावरण उपलब्ध रहता है जिससे यहाँ मीथेन का उत्पादन अधिक तेजी से होता है I

इसके अतिरिक्त मीथेन के अन्य प्राकृतिक उत्पादक हैं ज्वालामुखियों से निकली मिट्टी का कीचड़, चावल के खेत और कुछ हद तक दीमक भी I 

भूमिगत जीवाश्म ईंधन के उत्पादन के दौरान भी मीथेन का उत्सर्जन होता है I कोयले की खादान से बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन होता है I 

प्राकृतिक गैस के उत्पादन, भंडारण और स्थानांतरण के दौरान भी पाइपलाइनों से मीथेन गैस का रिसाव होता है I

लगभग 27 प्रतिशत मीथेन उत्सर्जन Enteric Fermentation के माध्यम से उत्पन्न होता है I 

Enteric Fermentation उन पशुओं में पाचन प्रक्रिया है जो जुगाली करते हैं जैसे कि भेड़, बकरी, गाय, भैंस आदि I इनके पाचन तंत्र में सूक्ष्मजीव भोजन को विघटित और किण्वित(ferment) करते हैं जिससे मीथेन का उत्पादन होता है।

वातावरण में मीथेन का एक छोटा हिस्सा आग से आता है, जिसमें जंगल की आग, चूल्हे जलाना और कृषि अपशिष्ट जलाना शामिल है।

वायुमंडल में मीथेन उत्सर्जन के अन्य मानवजनित स्रोत हैं – चावल की खेती, पशुपालन, कोयले और प्राकृतिक गैस का जलना, बायोमास का दहन और लैंडफिल में कार्बनिक पदार्थों का अपघटन।

वायुमंडल में मीथेन की सांद्रता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है।

औद्योगिक क्रांति के पहले वायुमंडल में मीथेन की सांद्रता लगभग 700ppb (parts per billion) थी जो आज बढ़कर लगभग 1870ppb हो गयी है I 

जैसा कि हम देख सकते हैं कि वायुमंडल में  कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में इसकी सांद्रता बहुत कम है I 

जहाँ कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता को ppm(parts per million) में मापा जाता है वहीं मीथेन की सांद्रता ppb(parts per billion) में मापा जाता है I 

इतना ही नहीं वातावरण में यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में काफी कम समय तक रहता है I

इसके बावजूद मीथेन उत्सर्जन को लेकर विश्वभर की सरकारें और पर्यावरणविद् चिंतित हैं I 

सभी ग्रीनहाउस गैसों में से मिथेन सबसे शक्तिशाली गैसों में से एक है I यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में अधिक शक्तिशाली है क्योंकि इसके प्रति अणु में उत्पादित Radiative Forcing अधिक है।

यह पृथ्वी के वातावरण में गर्मी को आसानी से अवशोषित करने की क्षमता रखता है। 

अध्ययनों से पता चला है कि –

20 साल की अवधि में पृथ्वी को एक किलोग्राम मीथेन, एक किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड से 80 गुना अधिक गर्म करता है।

मीथेन पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित एक free radical, जिसे hydroxyl कहा जाता है, से रासायनिक क्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाता है जहां वह सदियों तक रह सकता है।

स्पष्टतः कम मात्रा में भी मीथेन गैस का उत्सर्जन पर्यावरण के लिए बहुत घातक है I 

मीथेन गैस के उत्सर्जन को रोकना भी बहुत मुश्किल काम है क्योंकि इसके प्राकृतिक स्रोतों जैसे कि पशुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, धान की खेती का भी विस्तार हो रहा है I ऐसे और भी स्रोत हैं जिनपर नियंत्रण लगाना इतना आसान नहीं है I

फिर भी यदि कुछ तरीकों को अपनाया जाता है तो इसके उत्सर्जन को कम किया जा सकता है I

जैसे की तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन, भंडारण और परिवहन के लिए उपयोग होने वाले उपकरणों को और भी उन्नत किया जा सकता है जिससे कि मीथेन के रिसावों को कम किया जा सकता है।

कोयला खदानों से उत्सर्जित मीथेन को इकठ्ठा करके ऊर्जा के लिए उपयोग किया जा सकता है।

नाइट्रस ऑक्साइड:-

ग्रीनहाउस गैसों में नाइट्रस ऑक्साइड भी बहुत ही महत्वपूर्ण गैस है I यह पृथ्वी के वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है I

नाइट्रस ऑक्साइड को “हास्य गैस” के रूप में भी जानते हैं I

यह कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के बाद तीसरा सबसे ज्यादा समय तक वायुमंडल में उपस्थित रहने वाला ग्रीनहाउस गैस है। नाइट्रस ऑक्साइड के अणु औसतन 114 साल तक वायुमंडल में रहते हैं।

इतना ही नहीं यह ओजोन मंडल को नुकसान पहुँचाने वाले रासायनिक यौगिकों में से एक है I

यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वायुमंडल में कम समय तक उपस्थित रहता है परन्तु तुलनात्मक रूप से अधिक शक्तिशाली होता है I

नाइट्रस ऑक्साइड के एक पाउंड का प्रभाव, कार्बन डाइऑक्साइड के एक पाउंड के प्रभाव से लगभग 300 गुना अधिक होता है I

नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन प्राकृतिक और मानवीय स्रोतों दोनों द्वारा होता है I

नाइट्रस ऑक्साइड के कुल उत्सर्जन में कृषि क्षेत्र का सबसे बड़ा योगदान है I कृषि क्षेत्र में विभिन्न कृषि मृदा प्रबंधन गतिविधियों के कारण नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जैसे कि कृत्रिम और जैविक उर्वरकों के अनुप्रयोग, खाद का प्रबंधन, कृषि अवशेष को जलाना आदि।

ईंधन के जलने पर भी नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जित होता है।

उद्योगों में कुछ रसायनों जैसे कि नाइट्रिक एसिड के उत्पादन के दौरान भी नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है I  नाइट्रिक एसिड का उपयोग कृत्रिम उर्वरक बनाने के लिए किया जाता है I  

ऐसे उद्योगों में भी नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है जहाँ कृत्रिम फाइबर बनाये जाते हैं I

नाइट्रोजन चक्र के द्वारा यह वायुमंडल में हमेशा मौजूद रहता है I यह नाइट्रोजन चक्र वातावरण, पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों के बीच स्वाभाविक रूप से चलता रहता है।

मिट्टी और महासागरों में रहने वाले कुछ बैक्टीरिया नाइट्रोजन का विखंडन करते हैं जिससे नाइट्रस ऑक्साइड का प्राकृतिक रूप से उत्सर्जन होता है I 

Fluorinated gases / फ्लोराइड युक्त गैसें:

ग्रीनहाउस गैसों में प्रमुख फ्लोराइड युक्त गैसें हैं – क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC), परफ्लूरोकार्बन (PFC) और सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF6)

अन्य ग्रीनहाउस गैसों के विपरीत फ्लोराइड युक्त गैसों का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है और ये केवल मानवीय गतिविधियों से ही उत्सर्जित होती हैं।

इन फ्लोराइड युक्त गैसों में अन्य ग्रीनहाउस गैसों की तुलना में बहुत अधिक Global Warming  क्षमता (Global Warming Potential) होती है इसलिए वायुमंडल में इनकी कम सांद्रता भी Global Warming  पर बहुत अधिक प्रभाव डाल सकती है।

उदाहरण के तौर पर क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) की Global Warming  क्षमता कार्बन डाइआक्साइड की तुलना में 3800 गुना ज्यादा होती है I

फ्लोराइड युक्त गैसों का वायुमंडलीय जीवनकाल भी बहुत लम्बा होता है जो कुछ सौ सालों से लेकर कुछ हजार सालों तक हो सकता है।

Chlorofluorocarbon(CFC) और Hydrochlorofluorocarbon(HCFC) का उत्पादन और प्रयोग विश्व भर में अब रोक दिया गया है क्योंकि ये गैसें ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही थीं I

इनकी जगह अब हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) का प्रयोग किया जा रहा है I यह गैस CFC और HCFC की तरह ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुंचा रही है I परन्तु Global Warming  वृद्धि में इसका भी हाथ है I

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन का उपयोग रेफ्रीजरेटर और AC में शीतलक के रूप में, एरोसोल स्प्रे में, झाग पैदा करने वाले स्प्रे में, विलायक के रूप में और अग्निरोधी के रूप में किया जाता है।

परफ्लूरोकार्बन (PFC) का उत्सर्जन एल्यूमीनियम के निर्माण के दौरान होता है I PFC का प्रयोग अर्धचालक विनिर्माण उद्योग में भी होता है I

SF6 का उपयोग बिजली संयंत्रों में Insulation gas, Gas-insulated Switch-gear और Circuit breaker जैसे उपकरण के रूप में किया जाता है I 

Global Warming  में हो रही लगातार वृद्धि:-

Global Warming  में हो रही लगातार वृद्धि पर विश्व की विभिन्न संस्थानों ने हाल ही में अपनी-अपनी रिपोर्ट जारी की I

लगभग सभी रिपोर्ट के अनुसार 1850 के बाद 2019 पृथ्वी पर दूसरा सबसे गर्म साल रहा I जबकि 2016 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है I

WMO(World Meteorological Organization) द्वारा 15 जनवरी 2020 को जारी रिपोर्ट के अनुसार 2015-2019 की अवधि और 2010-2019 की अवधि के दौरान पृथ्वी का तापमान अपने उच्चतम स्तर पर था I

1980 के बाद से प्रत्येक दशक अपने पिछले दशक से गर्म रहा है और यह सब ग्रीनहाउस गैसों के कारण हुआ है I

WMO के इस रिपोर्ट के अनुसार 2015-2019 की अवधि के दौरान वार्षिक Global Warming  का औसत 1850-1900 की अवधि के औसत तापमान से 1.1 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा I 

1850-1900 की अवधि, जिसे पूर्व-औद्योगिक युग भी कहते हैं, को अक्सर Global Warming  की गणना के लिए आधार रेखा के रूप में उपयोग किया जाता है।

Global Warming  में साल-दर-साल किस तरह से वृद्धि हुई है इसे निम्नलिखित ग्राफ से आसानी से समझा जा सकता है जिसे Berkeley Earth नामक संगठन ने तैयार किया है I

Global Warming in hindi

Berkeley Earth के अनुसार 1951-1980 के दौरान औसत तापमान की तुलना में 2019 में पृथ्वी की 88% क्षेत्रफल का तापमान काफी अधिक था, 10% का तापमान सामान्य था और केवल 1.5% का तापमान काफी कम था।

Global Warming  के दुष्प्रभाव:- 

पृथ्वी के वायुमंडल के बढ़ते तापमान का दुष्प्रभाव ना केवल मनुष्य-जाति के ऊपर पड़ रहा है बल्कि पूरा जीव-जगत इससे प्रभावित है I

Global Warming  ने जहाँ मनुष्य के जीवन-निर्वाह में मुश्किलें पैदा की हैं वहीं जंगल और जल में निवासित जीवों का प्राकृतिक निवास खतरे में है I

Global Warming के निम्नलिखित कुछ ऐसे दुष्प्रभाव हैं जिनपर चर्चा करना जरुरी है I 

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि –

Global Warming  के कारण समुद्र के जलस्तर में दो तरीके से वृद्धि हो रही है – पहला, हिमनद और ध्रुवीय बर्फ की चादरें गर्मी के कारण पिघलती जा रही हैं और उनसे निकलने वाला पानी समुद्रों में आकर गिर रहा है जिससे उनके जलस्तर में वृद्धि हो रही है I 

दूसरा, जैसे-जैसे समुद्र का तापमान बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे समुद्र का पानी गर्म होकर फैल रहा है।

WMO के अनुसार पहले तरीके से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि ज्यादा तेजी से हो रहा है I

पिछले साल WMO द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2014-2019 की पांच साल की अवधि के दौरान समुद्र के जलस्तर में 5 मिमी प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई जबकि 2007-2016 की दस साल की अवधि के दौरान यह वृद्धि 4 मिमी प्रतिवर्ष थी I

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होने से समुद्र के किनारे बसे देशों और द्वीपों के डूबने का खतरा मंडरा रहा है I

इसके अलावा समुद्र के किनारे की मैन्ग्रोव वनस्पतियाँ भी उसके अन्दर समाहित हो जाएँगी I इससे समुद्र में आने वाले सुनामी  जैसे ऊँची लहरों से किनारे बसे लोगों का बचाव करना मुश्किल हो जायेगा।  

बर्फ का पिघलना:-

यदि Global Warming  के वृद्धि पर अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले कुछ वर्षों में अधिक तापमान के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर गायब जायेंगे, ध्रुवीय बर्फ, अंटार्कटिक में फैले विशाल बर्फ की चादरें सभी पिघलकर खत्म हो जायेंगे I

जलवायु में असामान्य परिवर्तन –

Global Warming  के कारण जलवायु में असामान्य परिवर्तन देखने को मिल रहा है I कहीं वर्षा इतनी अधिक हो रही है कि बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है तो कहीं सूखा पड़ रहा है I

मौसम अपने समय पर नहीं बदल रहे हैं, वर्षा के मौसम में भी गर्मी की स्थिति बन रही है I जाड़े के मौसम में भी कहीं-कहीं असामान्य स्तर पर ताप नीचे चला जा रहा है I

अधिक तापमान के कारण पृथ्वी की सतह पर वाष्पन तेजी से हो रहा है जिससे तालाब सूखते जा रहे हैं I

चक्रवातों की संख्या में वृद्धि –

तापमान में असामन्य वृद्धि के कारण चक्रवातों की संख्या और उनके प्रभाव में वृद्धि होगी I

खाद्य सुरक्षा में कमी-

बढ़ते Global Warming  का सबसे ज्यादा प्रभाव वैश्विक कृषि क्षेत्र में देखने को मिल रहा है I

विभिन्न फसलें एक विशिष्ट तापमान पर ही अच्छी तरह से पैदा होती हैं I वैश्विक तापमानों में परिवर्तन होने के कारण उनकी उत्पादकता में काफी हद तक परिवर्तन हुआ है I

उदाहरणस्वरुप विश्व के अधिकांश क्षेत्रों में पैदा होने वाली फसल चावल की उत्पादकता तापमान में वृद्धि के कारण कम होती जा रही है I

बिमारियों में वृद्धि-

अधिक तापमान कृषि कीटों और रोगाणुओं की वृद्धि के लिए अनुकूल होता है। कृषि कीटों की आबादी बढ़ने से फसल को भारी नुकसान हो सकता है I

इसी तरह मनुष्यों में होने वाली बहुत सी बीमारियाँ अब स्थानिक हो चुकी हैं जो तापमान वृद्धि के कारण किसी विशेष क्षेत्र को अधिक प्रभावित कर रही हैं I

बढ़े हुए तापमान में रोगाणुओं और कीड़ों की प्रजनन दर भी बढ़ जाती है I यह प्रजनन दर इतनी अधिक होती है कि उनकी संख्या में वृद्धि को नियंत्रित करने वाले विभिन्न उपायों और दवाओं का भी कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ रहा है।

जंगलों की आग में वृद्धि –

अधिक तापमान के कारण जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। साथ-ही-साथ अधिकांश वन क्षेत्रों में लगने वाली आग लंबे समय तक रहती है I

जंगलों में लगी इस आग के कारण बड़े पैमाने पर वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हुई है।

2019 में आर्कटिक क्षेत्र में ग्रीष्मकाल के दौरान जंगल में लगी आग एक अभूतपूर्व घटना थी।

WMO के अनुसार आर्कटिक क्षेत्र में लगी इस आग के कारण केवल जून महीने में वायुमंडल में 50 मेगाटन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ।

यह मात्रा 2010 से 2018 के बीच जून महीने में ही आर्कटिक क्षेत्र में लगी आग से हुए उत्सर्जन से कहीं अधिक था I

आने वाले समय में Global Warming  के कारण उपरोक्त घटनाओं की आवृति में और वृद्धि होगी I ये लंबे समय तक रहने के साथ-साथ और अधिक गंभीर हो जायेंगे।

उपरोक्त घटनाओं के अलावा बढ़ते तापमान के कारण समुद्र की प्रवाल भित्तियां समाप्त हो रही हैं और अन्य समुद्री जीवों के निवास स्थान को भी भारी नुकसान पहुँच रहा है I

Global Warming रोकने से सम्बंधित वैश्विक प्रयास:–

Global Warming में वृद्धि को लेकर आज पूरा विश्व चिंतित है I विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन के प्रयास किये जा रहे हैं I 

इसके लिए विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और देशों के मध्य उच्च स्तरीय कूटनीतिक बातचीत किये जा रहे हैं I उनके मध्य विभिन्न प्रकार की संधियाँ हो रही हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मलेन भी किये जा रहे हैं I 

इससे सम्बंधित प्रमुख संधियों, सम्मलेनों और समझौतों का विवरण इस प्रकार है –

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल-

यह एक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता है जिसे 15 सितम्बर 1987 को अपनाया गया I इस समझौते का मुख्य विषय मानव निर्मित ऐसे रसायनों के उत्पादन और खपत को नियंत्रित करना था जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रहे थे।

भारत ने इस समझौते पर 19 जून 1992 को हस्ताक्षर किया और इसका सदस्य बना।

वियना सम्मेलन-

यह 22 सितम्बर 1988 को प्रभावी हुआ I इस सम्मेलन का उद्देश्य ओजोन परत के क्षय होने का विश्व स्तर पर निगरानी और रिपोर्टिंग करना था।

United Nations Framework Convention on Climate Change(UNFCCC)-

1992 में विश्व के कई देश इस फ्रेमवर्क कन्वेंशन में शामिल हुए I इन देशों का इसमें शामिल होने का मुख्य उद्देश्य था औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग करना। 

UNFCCC का प्राथमिक लक्ष्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को एक स्तर तक स्थिर करना था I

क्योटो प्रोटोकोल-

इसे 11 दिसंबर 1997 को जापान के क्योटो शहर में विश्व के कई देशों द्वारा अपनाया गया लेकिन यह 16 फरवरी 2005 से प्रभावी हुआ I

इसका मुख्य उद्देश्य है ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना I

पेरिस समझौता-

यह समझौता 4 नवम्बर 2016 से प्रभावी हुआ और 197 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये I इसका भी मुख्य लक्ष्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना था I

स्टॉकहोम सम्मेलन-

यह 2001 में हस्ताक्षरित और मई 2004 से प्रभावी हुआ I इसका उद्देश्य ऐसे जैविक प्रदूषकों के उत्पादन और उपयोग को समाप्त करना या प्रतिबंधित करना है जो वायुमंडल में लम्बे समय तक उपस्थित रहते हैं।

किगाली संशोधन –

15 अक्टूबर 2016 को विश्व के 197 देशों ने अफ़्रीकी देश रवांडा के किगाली में इस संशोधन पर हस्ताक्षर किये I इसके द्वारा 1987 के Montreal Protocol में संशोधन किया गया I  

इसका उद्दे‍य वर्ष 2045 के अंत तक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन(HFC) के उत्सर्जन को लगभग 80-85 प्रतिशत तक कम करना है।

उपरोक्त संधियों और समझौतों के अलावा Global Warming पर प्रत्येक वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय बैठकें होती हैं I जिनमें Earth Summit , Conference of Parties(COP) आदि बैठकें हैं I

इन बैठकों में विश्वभर के देश शामिल होते हैं और Global Warming पर विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान पर बातचीत करते हैं I

बावजूद इसके ये समझौते और संधियाँ इतनी कारगर सिद्ध क्यों नहीं हो रही हैं ?

इसका एक प्रमुख कारण है विश्व के बड़े औद्योगिक देशों द्वारा इन समझौतों और सन्धियों को उचित समर्थन ना मिलना I 

इन देशों द्वारा अत्यधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया जा रहा है और यही देश इस तरह के समझौतों और संधियों से अपने आप को अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं I 

इससे Global Warming पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों को उपयुक्त गति नहीं मिल रही है जिसके कारण इन समझौतों और संधियों में रखे लक्ष्य को प्राप्त करना मुश्किल हो रहा है I

निष्कर्ष:

उपरोक्त लेख में हमने देखा कि कौन-कौन सी ग्रीनहाउस गैसें हैं जिनका उत्सर्जन प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों द्वारा होता है और इन गैसों का पृथ्वी के वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है I

इन ग्रीनहाउस गैसों के कारण ही Global Warming हमारे वैश्विक समाज के लिए प्रमुख चुनौती बनता जा रहा है।

यदि इन गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो निःसंदेह अगले कुछ दशकों में हमारी पृथ्वी की जलवायु पूरी तरह से बदल जाएगी।

Global Warming के कारण पृथ्वी पर स्थित ग्लेशियर और बर्फ की चादरें पिघल रहे हैं जिससे समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होती जा रही है I समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के कारण इसके किनारे बसे देशों और वनस्पतियों पर खतरा मंडरा रहा है I

Global Warming के कारण जंगलों में लगने वाली आग की घटनाएँ बढ़ जाएगी I साथ विश्व के कई क्षेत्रों में सूखे की स्थिति पैदा हो जाएगी जिससे फसल उत्पादन में कमी आएगी I

तो क्या Global Warming की समस्या से निपटा जा सकता है?

विकास की दौड़ में Global Warming को रोकना तो असंभव है, लेकिन कुछ अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के द्वारा इस समस्या को कम और धीमा किया जा सकता है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समाधान जरुरी है। 

दूसरा, सस्ते और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को विकसित करने के लिए विश्व के छोटे देशों को आर्थिक सहायता देने की जरुरत है I

यदि इस समस्या के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बातचीत नहीं होती है तो जल्द ही जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली प्राकृतिक आपदाओं बहुत से लोग मारे जाएंगे।

मनुष्य ने अपनी गतिविधियों से हरी-भरी पृथ्वी के पर्यावरण को बदल दिया है और अब इसकी ही जिम्मेदारी बनती है कि वह पर्यावरण को होने वाले इस नुकसान से बचाए।

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